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अमरनाथ जैसी यात्रा- नागद्वारी में 7 पहाड़, 16 किमी चढ़ाई:पैर फिसलते ही खाई में गिरने का खौफ; पहली बार भास्कर के साथ कीजिए यात्रा
['व न यक शर म', 'और न र यण स']
देश | दैनिक भास्कर
बेटा, यहां आना कोई मजबूरी नहीं... ये तो नागदेव का बुलावा है….
करीब 70-75 साल के उस बुजुर्ग की सांसें तेज चल रही थीं। एक हाथ बेटे के कंधे पर था, दूसरा लाठी पर। सामने फिसलन भरी चढ़ाई थी, नीचे सैकड़ों फीट गहरी ढलान। फिर भी उनके चेहरे पर थकान से ज्यादा सुकून था।हम नागद्वारी यात्रा के पहले पड़ाव भजियागिरी की ओर बढ़ रहे थे। कुछ ही देर पहले पचमढ़ी से 11 किलोमीटर दूर धूपगढ़ (नागमणी द्वार) से पैदल यात्रा शुरू की थी। सामने था करीब 16 किलोमीटर का वह रास्ता, जिसे लोग 'मध्य प्रदेश का अमरनाथ' कहते हैं। सालभर में दर्शन के लिए सिर्फ 10 दिन ही रास्ता खुलता है।हमनें श्रद्धालुओं के साथ नागद्वारी यात्रा पूरी की। रास्ते में क्या-क्या चुनौतियां मिलीं?
श्रद्धालुओं के अनुभव कैसे रहे?
वे बिना रुके, हांफते हुए मुस्कुराए और बोले, ‘बेटा, यहां आना कोई मजबूरी नहीं, ये तो नागदेव का बुलावा है।’जूतों के नीचे काई थी, सामने सीधी चढ़ाई और पीछे हजारों श्रद्धालुओं की भीड़। ऊपर से हल्की बारिश पगडंडी को और फिसलन भरा बना रही थी। तभी एक श्रद्धालु ने पीछे से आवाज लगाई- संभलकर... यहां अभी एक आदमी फिसलकर गिरा है और उसका पैर टूट गया है।कई बुजुर्ग यात्रा में मिले। कई छोटे-छोटे बच्चे अपने माता-पिता के साथ कंधे पर बैठकर आए हुए थे।आखिर नागद्वारी है क्या, और लोग यहां क्यों आते हैं?
सतपुड़ा की 7 पहाड़ियों को पार करने के बाद श्रद्धालु नागद्वार गुफा पहुंचते हैं, जहां भगवान पद्मशेष विराजते हैं। इस यात्रा से जुड़ी सबसे प्रचलित मान्यता भगवान शिव और भस्मासुर की कथा से जुड़ी है।कहा जाता है कि जब राक्षस भस्मासुर ने कठोर तपस्या के बाद भगवान शिव से ऐसा वरदान प्राप्त कर लिया कि जिसके सिर पर हाथ रखे, वह भस्म हो जाए, तो उसने उसी वरदान की परीक्षा शिव पर ही करनी चाही।खुद को बचाने के लिए भगवान शिव सतपुड़ा के इन्हीं दुर्गम जंगलों की ओर आए। स्थानीय मान्यता के अनुसार, उन्होंने अपने गले में विराजमान नागराज को इसी क्षेत्र की गुफाओं में सुरक्षित छोड़ दिया और स्वयं आगे चौरागढ़ की ओर चले गए। तभी से इस स्थान को नागद्वारी यानी 'नागलोक का द्वार' कहा जाने लगा।श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यहां दर्शन करने से नागदोष और कालसर्प दोष से मुक्ति मिलती है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और मनोकामनाएं पूरी होती हैं।‘यहां आते ही लगता है भगवान साथ चल रहे हैं’आगे यात्रा में हमारी मुलाकात वाशिम, महाराष्ट्र से आए रवि वसंता लठाड़ से हुई। हाथ में त्रिशूल और नाग की एक छोटी मूर्ति लिए वे अपने चौदह लोगों के जत्थे के साथ चल रहे थे। हमनें पूछा- ये लेकर कहां चढ़ाने जा रहे हैं?