विज्ञापनविज्ञापनविज्ञापनमुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने बघेल की उस याचिका का निपटारा किया, जिसमें उन्होंने हाईकोर्ट के 15 जून के अंतरिम आदेश को चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में चुनाव याचिका को कारण-ए-दावा नहीं होने और कानूनी आवश्यकताओं का पालन नहीं करने के आधार पर खारिज करने की बघेल की अर्जी को ठुकरा दिया था।सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बघेल के पास बचाव के लिए तर्क मौजूद हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि उनकी चुनौती खारिज किए जाने से चुनाव न्यायाधिकरण के समक्ष कार्यवाही के दौरान सभी बिंदुओं और दलीलों को उठाने के उनके अधिकार पर कोई असर नहीं पड़ेगा।बघेल की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलील दी कि चुनाव याचिका कानूनन सुनवाई योग्य नहीं है। वकील सुमीर सोढ़ी की सहायता से सिब्बल ने कहा कि चुनाव प्रचार 15 नवंबर को समाप्त हो गया था और बघेल कथित तौर पर 16 नवंबर को एक धार्मिक कार्यक्रम में मौजूद थे। याचिकाकर्ता ने इसे जनप्रतिनिधित्व अधिनियम (RPA) की धारा 126 का उल्लंघन बताया है।सिब्बल ने कहा कि आरोपों को स्वीकार करने के बावजूद धारा 126 का उल्लंघन केवल चुनावी अपराध हो सकता है, इसे अधिनियम की धारा 123(7) के तहत ‘भ्रष्ट आचरण’ नहीं माना जा सकता। उन्होंने कहा कि कथित तौर पर मौन अवधि शुरू होने के बाद बघेल ने रैली या रोड शो किया था, जिसे धारा 126 और आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन बताया गया है।सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि यह भी देखा जाना है कि कथित उल्लंघन से चुनाव का परिणाम ‘महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित’ हुआ या नहीं। सिब्बल ने कहा कि यह तथ्यात्मक सवाल है और याचिकाकर्ता के अनुसार भी कार्यक्रम में करीब 200 लोग ही शामिल हुए थे। उन्होंने कहा कि बघेल करीब 20 हजार मतों के अंतर से चुनाव जीते थे, इसलिए यह कहना मुश्किल है कि कथित सभा ने चुनाव परिणाम को प्रभावित किया।वकील सुमीर सोढ़ी के माध्यम से दायर याचिका में बघेल ने RPA की धारा 126 के तहत 48 घंटे की प्रचार मौन अवधि के उल्लंघन के आरोप से इनकार किया है। याचिका में कहा गया कि हाईकोर्ट ने चुनाव याचिका खारिज करने से इनकार कर गलती की। बघेल ने दावा किया कि याचिका में पर्याप्त तथ्य नहीं हैं, आरोप अस्पष्ट और अनुमान आधारित हैं तथा RPA की धारा 83 के तहत आवश्यक हलफनामा भी प्रस्तुत नहीं किया गया है।