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हार-जीत बनाम अधिकार और कर्तव्य: एकसाथ कदमताल हो, तभी देश का लोकतंत्र मजबूत, जंतर-मंतर की घटना के और कितने सबक?
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Latest And Breaking Hindi News Headlines, News In Hindi | अमर उजाला हिंदी न्यूज़ | - Amar Ujala
जंतर-मंतर की घटना ने देश को फिर दो खेमों में बांट दिया है। एक पक्ष की नजर सिर्फ पुलिस के लाठीचार्ज, आंसू गैस और दमन की तस्वीरों पर टिकी है। दूसरा पक्ष बैरिकेड टूटने, संसद की ओर बढ़ती उग्र भीड़ और सुरक्षाकर्मियों पर हुए हमलों को आधार बनाकर अपनी बात कह रहा है। दोनों अपने-अपने सच के साथ खड़े हैं, मगर लोकतंत्र को पूरे सच और संतुलन की जरूरत होती है।विज्ञापनविज्ञापनविज्ञापनलोकतंत्र में विरोध दर्ज कराने का अधिकार उतना ही पवित्र माना जाता है, जितना कानून का शासन। दोनों में संतुलन होना चाहिए। जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति दी गई थी, संसद की ओर कूच की नहीं। संसद की सुरक्षा केवल सरकार की नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्र की साझा जिम्मेदारी है। जब हजारों लोग जबरन सुरक्षा घेरा तोड़कर आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं, तब पुलिस बल के सामने कार्रवाई के अलावा व्यावहारिक रूप से बहुत सीमित विकल्प ही बचते हैं। दूसरी ओर, राज्य को शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए बल प्रयोग का अधिकार बेशक प्राप्त है, पर इसे किसी भी हालत में असीमित नहीं ठहराया जा सकता। पुलिस द्वारा यदि कहीं आवश्यकता से अधिक बल प्रयोग हुआ हो, या पेशेवर मानकों का उल्लंघन सामने आया हो, तो उसकी निष्पक्ष जांच बिना किसी देरी के होनी चाहिए।एक और चिंताजनक सवाल यह भी है कि आखिर आम जनता के बीच पुलिस की छवि लगातार क्यों धुंधली पड़ती जा रही है। यह छवि रातों-रात नहीं बिगड़ी। यह बरसों की उस दूरी का परिणाम है, जो पुलिस और आम नागरिकों के बीच बनती चली गई है। भ्रष्टाचार की घटनाएं, सुनवाई न होने की शिकायतें, इन सबने मिलकर एक ऐसी छवि गढ़ दी है, जिसमें वर्दी को अक्सर संदेह से देखा जाने लगा है। भर्ती से लेकर प्रशिक्षण तक, थाने के व्यवहार से लेकर जवाबदेही तक, हर स्तर पर सुधार की जरूरत लंबे समय से लंबित है। लोकतंत्र में पुलिस की साख व्यवस्था की रीढ़ मानी जाती है और उसके कमजोर पड़ने का असर पूरे तंत्र पर पड़ता है।इस सिक्के का एक दूसरा पहलू समाज की तरफ भी उतनी ही गंभीरता से मुड़ता है। आने वाली पीढ़ी जिस तरह अपने ही सुरक्षाकर्मियों को लेकर मीम बनाती दिखती है, जिस हल्केपन से गंभीर घटनाओं का मजाक गढ़ा जाता है और जिस तरह बिना तथ्य जाने आरोपों की झड़ी लगा दी जाती है, उसे पूरे सामाजिक ताने-बाने में आ रही दरार की तरह देखा जाना चाहिए। यह सवाल केवल तकनीक या सोशल मीडिया की तेज रफ्तार का नहीं, बल्कि संस्कारों के धीरे-धीरे छीजते जाने का भी है। जो जवान सरहद और सड़क पर अपनी जान जोखिम में डालकर खड़ा होता है, उसे लेकर हंसी-ठिठोली और सतही आरोप गढ़ना किसी सभ्य समाज की पहचान नहीं हो सकती। आलोचना और उपहास में एक बारीक, पर बहुत जरूरी रेखा होती है, जो धुंधली पड़ती दिख रही है।सवाल यह भी है कि जवाबदेही सिर्फ पुलिस की तय होगी या समाज और नागरिकों की भी। शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अनुमति का उल्लंघन किसने किया, बैरिकेड किसने तोड़े और सरकारी संपत्ति को नुकसान किसने पहुंचाया, इसका जवाब भी जरूरी है। संविधान ने नागरिकों को कई मौलिक अधिकार दिए हैं, पर उसी संविधान में मौलिक कर्तव्यों का भी स्पष्ट उल्लेख है। विडंबना यह है कि अधिकारों की रक्षा पर टीवी पर रोज बहस होती है, पर कर्तव्यों पर शायद ही कभी सार्थक बहस होती दिखती है।इस पूरे विमर्श में राजनीतिक दलों की भूमिका भी निराशाजनक ही है। सत्ता में रहते हुए जो दल कानून-व्यवस्था की दुहाई देते हैं, वही विपक्ष में आते ही हर पुलिस कार्रवाई को दमन करार देने लगते हैं। जरूरत इस बात की है कि आंदोलन का नेतृत्व करने वाले लोग भी गंभीर आत्ममंथन करें। गांधीजी ने चौरी चौरा की एक हिंसक घटना के बाद अपना असहयोग आंदोलन वापस ले लिया था, क्योंकि उनके लिए आंदोलन की सफलता से बड़ा मूल्य उसकी नैतिकता और अनुशासन था।जंतर-मंतर की इस घटना को किसी एक पक्ष की हार या जीत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसका निष्कर्ष केवल इतना है कि पुलिस की हर कार्रवाई की पूरी निष्पक्षता से समीक्षा हो, और समाज भी अपने भीतर झांककर यह पूछे कि वर्दी के प्रति सम्मान और असहमति के बीच का संतुलन कहां खोता जा रहा है। लोकतंत्र नागरिकों को केवल अपनी बात मनवाने का अधिकार ही नहीं देता, बल्कि विरोध की मर्यादा बनाए रखने का दायित्व भी सौंपता है। जब अधिकार और कर्तव्य, दोनों एक साथ कदमताल करते हैं, तभी देश का लोकतंत्र और उसकी संस्थाएं मजबूत बनी रहती हैं।