आंबेडकर ने संविधान में आरक्षण की व्यवस्था न कराई होती, तो जो थोड़े से दलितों को आज शिक्षा और नौकरियों में प्रतिनिधित्व मिला है, वह भी नहीं मिलता। अगर भारत का कोई समाज इक्कीसवीं सदी में भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित है और जिल्लत-भरी जिंदगी जीने के लिए मजबूर है, तो क्या यह माना जाएगा कि वह देश का नागरिक है और तरक्की कर रहा है?