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Comment on मुद्राराक्षस : दलित-बहुजन समाज के चितेरे रचनाकार by Upendra Pathik
['Ramnaresh Yadav र मनर श य दव', 'र मनर श य दव']
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हालांकि मुद्राराक्षस की रचनाएं सन् 1951 से ही छपनी शुरू हुई थीं, लेकिन आपातकाल के बाद ही उनकी रचनात्मकता और वैचारिकता में नया उठान आया। अनेक विधाओं में उनकी करीब 65 रचनाएं प्रकाशित हैं। ‘हम सब मनसाराम’, ‘शांति भंग’ और ‘दंडविधान’ जैसी रचनाओं के माध्यम से दलित, स्त्री और अल्पसंख्यक सहित हाशिए के समाज को हिंदी रचना संसार में केंद्रीय स्थान दिलाने में सफल रहे। समालोचक वीरेंद्र यादव लिखते हैं– “‘अर्द्धवृत’ नामक उपन्यास मुद्राराक्षस की अभिनव कहन शैली और प्रयोगधर्मिता का बेजोड़ उदाहरण है। इस उपन्यास की काल्पनिक कहानी में तर्कशीलता और रूढ़िभंजक विचारधारा के साथ-साथ उनके जीवन के भोगे यथार्थ का बिंब स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होते हैं।” साहित्य के अतिरिक्त समाज और राजनीति से उनका गहरा नातेदारी रही है। सामाजिक सरोकारों से उपजे आंदोलनों से जुड़े बगैर वे जी नहीं सकते थे। वे विभिन्न सामयिक और सामाजिक…