ऐसा क्यों होता है, इसका अनुमान लगाना जटिल नहीं है। विश्वविद्यालयों में जातिवाद असरहीन नहीं है। कहा तो यह जाना चाहिए कि विश्वविद्यालयों को गुरूकुल के माफिक बनाकर रखा गया है, जहां वंचित वर्गों के छात्रों के लिए बाधाओं की कोई कमी नहीं है। बताते चलें कि मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू होने से पूर्व विश्वविद्यालयों में ओबीसी वर्ग के शिक्षकों की संख्या लगभग शून्य थी। हालांकि एससी वर्ग का आरक्षण तो पहले ही से था, परंतु इन जगहों पर योग्य अभ्यर्थी न मिलने का बहाना बनाकर इन पर नियुक्तियां नहीं की जाती थीं और कमोबेश यही स्थिति आज भी है। आरक्षण लागू होने के बावजूद देश भर के विश्वविद्यालयों और तकनीकी संस्थानों में इन वर्गों के हजारों शिक्षकों के पद खाली पड़े है। इसका एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि जब इन संस्थानों में शिक्षकों की भर्तियां निकलती हैं तो कुछ लोग विभिन्न मामलों को लेकर कोर्ट में चले जाते हैं…